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क्रोधित हूँ, आवेशित हूँ,
असहिष्णु तक घोषित हूँ।
अब भी क्या मैं चुप रहूँ,
जब चहुँ दिशा से शोषित हूँ।।
पहचान मुझे मैं भारत हूँ।
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हर जुल्म के आगे डटा रहा था,
तुफानो में मैं खड़ा रहा था।
तब भी घुटने टेके ना थे,
जिद्द पर अपनी अड़ा रहा था।।
वो दौर गया,
मैं आज़ाद हुआ,
सोचा अब मेरे भी दिन बदलेंगे।
ना जान सका,
पहचान सका,
कि शत्रु तो भीतर ज्यादा पनपेंगे।।
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आज तो मैं अपनों से ही आहत हूँ।
पहचान मुझे मैं भारत हूँ।।
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छला जा रहा अपनों से,
झूठ मुठ के सपनो से।
दुष्ट निवाले छीन रहे,
दीन, दुखी और बच्चों से।।
जो भूल गए वो याद करो,
मैं ही शिव का तांडव हूँ।
रघुकुल का राम हूँ मैं,
अर्जुनरूपि पांडव हूँ।।
अधर्म का नाशी मैं महाभारत हूँ।
पहचान मुझे मैं भारत हूँ।
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इस धरा की खोई विरासत हूँ।
पहचान मुझे मैं भारत हूँ।
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